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जन्माष्टमी : श्री कृष्ण की शिक्षा और ज्ञान हाल के समय के लिये है सुसंगत

फाइल फोटो

जन्माष्टमी : श्री कृष्ण की शिक्षा और ज्ञान हाल के समय के लिये है सुसंगत

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र के दिन मध्यरात्रि को 12 बजे हुआ था। श्रीकृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी के नाम से न केवल भारत में बल्कि नेपाल, अमेरिका सहित पूरे विश्वभर में मनाया जाता है। श्रीकृष्ण का अष्टमी तिथि के दिन जन्म होना ये दर्शाता है कि वे आध्यात्मिक और सांसारिक दुनिया में पूर्ण रूप से परिपूर्ण थे। श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव जेलों में विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। वह माता देवकी और पिता वासुदेव की 8वीं संतान थे। जब आकाशवाणी हुई कि कंस की मृत्यु देवकी के 8वीं संतान के हाथों होगी। तो कंस ने अपनी बहन देवकी और बहनोई को कारागार में डाल दिया। और एक के बाद एक देवकी की सभी संतानों को मार दिया। लेकिन जब कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि को हुआ तब कारागार के द्वार अपने आप ही खुल गए और सभी सिपाही सो गए। और वसुदेव भगवान श्रीकृष्ण को सूप में लेकर गोकुल चले गए।

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पुराणों के अनुसार ,कृष्ण बाबा नंद के घर उनकी पत्नी यशोदा के साथ मथुरा में पलते बढ़ते है। भागवत पुराण में कृष्ण की आठ पत्नियों का वर्णन मिलता है, जो रुक्मिणी , सत्यभामा, जामवंती , कालिंदी , मित्रवृंदा , नाग्नजिती,भद्रा और लक्ष्मणा के रूप में मिलती हैं। राधा के साथ उनके अलौकिक प्रेम का वर्णन सभी को भाव विभोर कर देता है। राधा कृष्ण का प्रेम अंहकार को मिटा देता है। जब कृष्ण के कहने पर ऊधौ राधा को निर्गुण ब्रह्म की शिक्षा देने जाते हैं तो वो भी राधा के प्रेम के आगे नतमस्तक हो जाते हैं और ऊधौ के मन का अहंकार खत्म हो जाता है। तब श्रीकृष्ण ऊधौ से कहते हैं की ज्ञान की राह कभी कभी जटिल हो जाती है जहां कभी कभार इंसान उलझ जाता है। लेकिन प्रेम की राह बड़ी सीधी होती है वहां मनुष्य खुद को ही भूल जाता है और जो खुद को भूल जाता है उसे कभी अहंकार ही नहीं हो सकता है और वह मुझ तक पहुंच जाता है। श्रीकृष्ण जहां एक ओर सभी को प्रेम का पाठ पढ़ाते हैं तो वहीं कुरुक्षेत्र में अर्जुन को धर्म के लिए युद्ध करने की शिक्षा देते हैं। कुरुक्षेत्र में अर्जुन जब सामने अपनों को देखकर विचलित होते हैं तो श्रीकृष्ण ही उन्हें जीवन की नैतिकता और नश्वरता की प्रकृति के बारे में ज्ञान देते है। श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच बातचीत को भगवद् गीता नामक एक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। गीता में सांख्य योग , कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग, एक ईश्वरावाद आदि पर बहुत ही सुंदर तरीके से चर्चा की गई है। कृष्ण को विष्णु का पूर्ण अवतार माना जाता है, आजभारत के बाहर भी कृष्ण को मानने वाले एवं अनुसरण एवं विश्वास करने वालो की बहुत बड़ी संख्या है। कृष्ण के भक्तों ने लीला की अवधारणा को ब्रह्मांड के केंद्रीय सिद्धांत के रूप में माना जिसका अर्थ है ‘दिव्य नाटक’। यह भक्ति योग का एक रूप है, तीन प्रकार के योगों में से एक भगवान कृष्ण द्वारा भगवद गीता में चर्चा की है। कृष्ण की कहानियों ने भारतीय थियेटर, संगीत, और नृत्य के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, विशेष रूप से रासलीला की परंपरा के माध्यम से। ये कृष्ण के बचपन, किशोरावस्था और वयस्कता के नाटकीय कार्य हैं। एक आम दृश्य में कृष्ण को रासलीला में बांसुरी बजाते दिखाया जाता हैं, जो केवल कुछ गोपियों को सुनाई देती है तथा जो धर्मशास्त्रिक रूप से दिव्य वाणी का प्रतिनिधित्व करती है जिसे मात्र कुछ प्रबुद्ध प्राणियों द्वारा सुना जा सकता है। कुछ पाठ की किंवदंतियों ने गीत गोविंद में प्रेम और त्याग जैसे माध्यमिक कला साहित्य को प्रेरित किया है। विशेषकर कथक , ओडिसी , मणिपुरी ,कुचीपुड़ी और भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्य शैलियां उनके कृष्ण-संबंधी प्रदर्शनों के लिए जाने जाते हैं। कृष्णाट्टम ने अपने मूल को कृष्ण पौराणिक कथाओं के साथ रखा है और यह कथकली नामक एक अन्य प्रमुख शास्त्रीय भारतीय नृत्य रूप से जुड़ा हुआ है। जैन धर्म की परंपरा में 63 शलाकपुरुषों की सूची है, जिनमे चौबीस तीर्थंकर (आध्यात्मिक शिक्षक) और त्रिदेव के नौ समीकरण शामिल हैं। इनमें से एक समीकरण में कृष्ण को वासुदेव के रूप में, बलराम को बलदेव के रूप में, और जरासंध को प्रति -वासुदेव के रूप में दर्शाया जाता है। कृष्ण की कहानी बौद्ध धर्म की जातक कहानियों में मिलती है। विदुरपंडित जातक में मथुरा का उल्लेख है, घट जातक में कंस , देवकी, वासुदेव, गोवर्धन, बलराम और कान्हा का उल्लेख है. बहाई पंथियों का मानना ​​है कि कृष्ण ” ईश्वर के अवतार ” में से एक है जिन्होंने धीरे-धीरे मानवता को परिपक्व बनाने के लिए भगवान की शिक्षा को प्रकट किया है। इस तरह, कृष्ण का स्थान इब्राहीम , मूसा , जोरोस्टर , बुद्ध , मुहम्मद ,यीशु , बाब, और बहाई विश्वास के संस्थापक बहाउल्लाह के साथ साझा करते हैं। अहमदिया , एक आधुनिक युग का पंथ है , कृष्ण को उनके मान्य प्राचीन प्रवर्तकों में से एक माना जाता है। श्री कृष्ण का सबसे अद्भुत गुण यह है कि वे सभी संतों में सबसे श्रेष्ठ ओर पवित्र होने के बावजूद वे अत्यंत नटखट भी हैं। उनका स्वभाव दो छोरों का सबसे सुन्दर संतुलन है। वे एक महान शिक्षक और आध्यात्मिक प्रेरणा के अलावा उत्कृष्ट राजनीतिज्ञ भी थे। एक तरफ वे योगेश्वर हैं तो वहीं दूसरी ओर वे नटखट चोर भी हैं। भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा और ज्ञान हाल के समय के लिये सुसंगत हैं क्योंकि वे व्यक्ति को सांसारिक कायाकल्पों में फँसने नहीं देती और संसार से दूर होने भी नहीं देती। वे एक थके हुए और तनावग्रस्त व्यक्तित्व को पुनः प्रज्वलित करते हुये और अधिक केंद्रित और गतिशील बना देती है। भगवान श्री कृष्ण हमें भक्ति की शिक्षा कुशलता के साथ देते हैं।

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