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पंजाब से बांदा जेल पहुंचे विधायक मुख़्तार अंसारी, आखिर क्यों मुख़्तार पर योगी सरकार कर रही है इतनी सख़्ती?

लखनऊ। मऊ से बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी मंगलवार देर रात बांदा जेल पहुंच गये। वह अब बांदा जेल के बैरक नंबर 15 में रहेंगे। बताया जा रहा है कि बैरक नंबर-15 तन्हाई सेल है, यानी कि मुख़्तार के साथ कोई अन्य कैदी नहीं होगा। वहीं मुख्‍तार के आने से पहले बांदा जेल को पूरी तरह से सीसीटीवी कैमरों से लैस कर द‍िया गया है।

सूत्रों की माने तो मुख्तार के आसपास जाने वाला हर जेल कर्मी बॉडी वॉर्न कैमरे से लैस रहेगा, जिससे उसके और मुख्तार के बीच हुई बातचीत और व्यवहार की रिकॉर्डिंग हो सके। जेल की निगरानी के लिए एक ड्रोन कैमरा भी लखनऊ से भेजा गया है, वहीं मुख्तार अंसारी की बैरक और आसपास के इलाके को सीसीटीवी कैमरों से लैस कर दिया गया है।

ये है विधायक मुख़्तार अंसारी की पूरी कहानी

मुख़्तार अंसारी को पंजाब से यूपी लाने की ये ख़बर पिछले कई दिनों से लगातार सुर्खियों में है। आज हम आपको बताते हैं कौन हैं मुख़्तार अंसारी और क्या है उनकी कहानी?

पूर्वांचल के मऊ से लगातार पाँचवीं बार विधायक चुने गए मुख़्तार अंसारी की बहुत सारी कहानियां है, कोई मुख्तार अंसारी को माफिया कहता है तो कोई मसीहा, किसी के लिए मुख्तार खूंखार अपराधी हैं, तो किसी के लिए फरिश्ता, देश की अलग-अलग अदालतों में हत्या, हत्या के प्रयास, हथियारबंद तरीक़े से दंगे भड़काने, आपराधिक साज़िश रचने, आपराधिक धमकियाँ देने, सम्पत्ति हड़पने के लिए धोखाधड़ी करने, सरकारी काम में व्यावधान पहुंचाने से लेकर जानबूझकर चोट पहुंचाने तक के 16 मामले हैं, इनमें से कुछ अहम मामलों में अदालत ने सबूतों की कमी, गवाहों के पलट जाने और सरकारी वकील की कमज़ोर पैरवी के कारण इन्हें बरी कर दिया गया है।

1996 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचने वाले मुख़्तार ने 2002, 2007, 2012 और फिर 2017 में भी मऊ से जीत हासिल की। इनमें से आख़िरी तीन चुनाव उन्होंने देश की अलग-अलग जेलों में बंद रहते हुए लड़े और जीते। ख़ास बात यह है की मुख़्तार अंसारी और उनके परिवार का राजनीतिक प्रभाव ग़ाज़ीपुर से लेकर मऊ, जौनपुर, बलिया और बनारस तक है। सिर्फ़ 8-10 प्रतिशत मुसलमान आबादी वाले ग़ाज़ीपुर में हमेशा से अंसारी परिवार हिंदू वोट बैंक के आधार पर चुनाव जीतता रहा है।

मुख्तार अंसारी का परिवार ग़ाज़ीपुर के ‘प्रथम राजनीतिक परिवार’ के तौर पर जाना और पहचाना जाता है। पिछले तक़रीबन 15 सालों से जेल में बंद मुख़्तार अंसारी के दादा देश की आज़ादी के संघर्ष में गांधी जी का साथ देने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं और 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी थे।’ मुख़्तार अंसारी के नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 1947 की लड़ाई में शहादत के लिए महावीर चक्र से नवाज़ा गया था।

ग़ाज़ीपुर में साफ़-सुथरी छवि रखने वाले और कम्युनिस्ट बैकग्राउंड से आने वाले मुख़्तार के पिता सुभानउल्ला अंसारी स्थानीय राजनीति में सक्रिय थे। भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में मुख़्तार अंसारी के चाचा हैं।

मुख़्तार के बड़े भाई अफ़जाल अंसारी ग़ाज़ीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा से लगतार 5 बार (1985 से 1996 तक) विधायक रहे और 2004 में ग़ाज़ीपुर से ही सांसद का चुनाव भी जीते। मुख़्तार के दूसरे भाई सिबकातुल्ला अंसारी भी 2007 और 2012 के चुनाव में मोहम्मदाबाद से ही विधायक रह चुके हैं।

मुख़्तार अंसारी के दो बेटे हैं, उनके बड़े बेटे अब्बास अंसारी शॉट-गन शूटिंग के चैंपियन रह चुके हैं। 2017 के चुनाव में मऊ ज़िले की ही घोसी विधानसभा सीट से अब्बास ने बसपा के टिकट पर अपना पहला चुनाव लड़ा था और 7 हज़ार वोटों के अंतर से हार गए थे।

मुख़्तार के छोटे बेटे उमर अंसारी भारत के बाहर पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में वह भी पहली बार राजनीति में उतरे अपने पिता के पक्ष में मऊ से उनका चुनावी कैम्पेन चलाया।

आखिर क्यों हो रही है मुख्तार पर इतनी सख्ती ?

योगी सरकार आखिर मुख्तार की इतनी घेराबंदी क्यों कर रही है, योगी सरकार की इस कवायद का मक़सद क्या है ? पहला मकसद तो एक माफिया के खिलाफ कार्रवाई का दिखाई पड़ता है, लेकिन जानकारों की मानें तो मक़सद कुछ और ही है, दूसरा मकसद थोड़ा धुंधला है। जानकारों का मानना है कि पूर्वांचल के कई जिलों में राजनीतिक समीकरण को सत्ताधारी भाजपा बदलने की ख्वाहिशमंद है। वैसे तो गोरखपुर से लेकर प्रयागराज तक मुख्तार अंसारी का असर देखने को मिलता है, लेकिन मऊ और गाजीपुर में दबदबा ज्यादा रहा है। तो आईये जानते हैं कि मुख्तार के कमजोर पड़ने से इन जिलों में भाजपा को क्या फायदा हो सकता है?

मऊ- 2017 के विधानसभा चुनाव में मऊ में भाजपा का प्रदर्शन शानदार रहा था। चार में से तीन सीटें पार्टी ने जीती थीं लेकिन, जिले में क्लीन स्वीप की उसकी ख्वाहिश मुख्तार अंसारी की वजह से मटियामेट हो गयी थी। मुख्तार के कमजोर पड़ने से ये सीट भाजपा की झोली में जा सकती हैं। बता दें कि मुख्तार 2017 में बसपा के टिकट से चुनाव जीता था। ऐसे में बसपा का कैडर वोट भी उसे मिला, अब यदि किसी पार्टी ने मुख्तार को पनाह नहीं दी तो चुनाव जीतना आसान नहीं होगा।

गाजीपुर- भाजपा के लिए ये जिला भी बहुत चुनौतीपूर्ण रहा है। 2017 के चुनाव में ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा की वैशाखी के सहारे उसे सात में से महज तीन सीटें मिली थीं। हालात 2017 जैसे ही रहे तो भाजपा को गाजीपुर में 2022 के चुनाव में लोहे के चने चबाने पड़ेंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव में इसकी बानगी देखने को मिल चुकी है, जब दिग्गज नेता मनोज सिन्हा को मुख्तार के भाई अफजाल ने हरा दिया था। इस बार तो ओमप्रकाश राजभर भी साथ नहीं हैं। ऐसे में मुख्तार परिवार की कमजोरी और ध्रुवीकरण ही उसकी सबसे बड़ी उम्मीद है, उम्मीद इस बात की है कि यदि मुख्तार पर कार्रवाई से मुस्लिम मतदाताओं का और ज्यादा ध्रुवीकरण हुआ तो इसके रिएक्शन में हिंदू मतदाताओं का भी ध्रुवीकरण जोर पकड़ेगा और तब पार्टी लाइन से अलग होकर सभी भाजपा के खेमे में आने को मजबूर होंगे।

आजमगढ़- इस जिले का तो नाम सुनकर ही भाजपा नेताओं के माथे पर बल पड़ जाता है। 2017 के नतीजे ही कुछ ऐसे आये थे। जिले की 10 सीटों में से भाजपा को महज एक ही नसीब हुई थी, इस जिले में मुस्लिम, यादव, पिछड़ों और दलितों की बहुत बड़ी संख्या है, इसलिए इस जिले में सपा और बसपा का दबदबा 2017 में भी दिखा था। जब प्रदेश में भाजपा की आंधी चली थी, भाजपा को आजमगढ़ में तभी जीत मिल सकती है, जब पार्टी लाइन से अलग होकर लोग वोट करें। वैसे तो मुस्लिम मतदाताओं को छोड़ दिया जाये तो बाकी सभी समुदायों में भाजपा ने दूसरी सीटों पर जबरदस्त सेंधमारी की थी लेकिन, आजमगढ़ में उसकी सोशल इंजीनीयरिंग फेल हो गयी थी। अब मुख्तार, अतीक और आज़म की ओवर ब्रांडिंग से हालात बदलने की उम्मीद पार्टी के नेता लगा सकते हैं।

 

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