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प्रणब दा विशेष : पत्रकार, प्रोफेसर, राजनेता जानिये किन किन रूपों में पूर्व राष्ट्रपति ने निभाई थी भूमिका

फाइल फोटो

नई दिल्ली। कोरोना काल न केवल लोगों में दहशत लेके आया बल्कि इस भयानक वायरस ने कई चहेते लोगों को हमसे दूर भी कर दिया है। इसी फेहरिस्त में एक और नाम शामिल हो गया जब देश के पूर्व राष्ट्रपति और महान राजनेता प्रणब मुखर्जी का सोमवार को अस्पताल में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार आज दोपहर करीब 2 बजे नई दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान घाट में किया जाएगा। प्रणब मुखर्जी के निधन पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सीडीएस बिपिन रावत, संघ प्रमुख मोहन भागवत समेत सभी प्रमुख नेताओं ने पूर्व राष्ट्रपति को श्रद्धांजलि दी। प्रणब के निधन पर 7 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का 84 साल की उम्र में हुआ निधन!

क्लर्क रहे, कॉलेज में भी पढ़ाया

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का जन्म ब्रिटिश दौर की बंगाल प्रेसिडेंसी के मिराती गांव में 11 दिसंबर 1935 को हुआ था। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से पॉलिटिकल साइंस और हिस्ट्री में एमए किया। अपने करियर की शुरुवात प्रणब मुखर्जीजी ने पोस्ट एंड टेलेग्राफ़ ऑफिस से की थी जहां वे एक क्लर्क थे. सन 1963 में विद्यानगर कॉलेज में वे राजनीती शास्त्र के प्रोफेसर बन गए और साथ ही साथ देशेर डाक में पत्रकार के रूप में कार्य करने लगे. इनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी एक स्वतंत्रता संग्रामी थे और 1952-64 तक बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे. इनकी माता गृहणी एवं भारतीय स्वतंत्रता सैनानी थी. घर में राजनैतिक माहोल होने की वजह से बचपन से ही प्रणब मुखर्जी का मन राजनीति में आने का था.

1969 में शुरू हुआ राजनीतिक सफर
प्रणब के पॉलिटिकल करियर की शुरुआत 1969 में हुई। उन्होंने मिदनापुर उपचुनाव में वीके कृष्ण मेनन का कैम्पेन सफलतापूर्वक संभाला था। तब प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें पार्टी में शामिल कर लिया। और 1969 में ही प्रणब मुखर्जी राज्यसभा के लिए चुने गए। इसके बाद 1975, 1981, 1993 और 1999 में राज्यसभा के लिए लगातार चुने गए। वे थोड़े ही समय में इंदिरा गांधी के विश्वासपात्र बन गए थे. सन 1973 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान वे औद्योगिक विकास मंत्रालय में उप-मंत्री बन गए. सन 1975-77 में आपातकालीन स्थिति के दौरान प्रणब मुखर्जी पर बहुत से आरोप भी लगाये गए. लेकिन इंदिरा गांधी की सत्ता आने के बाद उन्हें क्लीन चिट मिल गई. इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान प्रणब मुखर्जी सन 1982से 1984 तक वित्त मंत्री के पद पर आसीन रहे. इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गाँधी से प्रणब के संबंध कुछ ठीक नहीं रहे और राजीव गाँधी ने अपने कैबिनेट मंत्रालय में प्रणब दा को वित्त मंत्री बनाया था. लेकिन राजीव गाँधी से मतभेद के चलते प्रणब दा ने अपनी एक अलग “राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस” पार्टी गठित कर दी. सन 1985 में प्रणब दा पश्चिम बंगाल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी रहे. थोड़े समय के बाद 1989 में राजीव गाँधी के साथ सुलह हो गई और वे एक बार फिर कांग्रेस से जुड़ गए. कुछ लोग इसके पीछे की वजह ये बोलते थे कि इंदिरा गाँधी की मौत के बाद प्रणब दा खुद को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में देखते थे, लेकिन उनकी मौत के बाद राजीव गाँधी से सब उम्मीद करने लगे. पी वी नरसिम्हा राव का प्रणब मुखर्जी के राजनैतिक जीवन को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ा योगदान रहा . पी वी नरसिम्हा राव जब प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने प्रणब मुखर्जी को योजना आयोग का प्रमुख बना दिया था. थोड़े समय बाद उन्हें केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विदेश मंत्रालय का कार्य भी सौंपा गया.उन्होंने 2004 से 2006 तक रक्षा मंत्री और 2006 से 2009 तक एक बार पुन: विदेश मंत्री के रूप में कार्य किया। वे 2009 से 2012 तक दोबारा वित्त मंत्री तथा 2004 से 2012 तक, जब उन्होंने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा दिया, लोकसभा के नेता बने रहे। मुखर्जी ने 2004-2012 की अवधि के दौरान, 95 से अधिक मंत्री समूह/ अधिकार प्राप्त मंत्री समूह के अध्यक्ष के रूप में प्रशासनिक सुधार, सूचना का अधिकार, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार, यूआईडीएआई, आधार आदि की स्थापना जैसे कई मुद्दों पर सरकार के महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और भारत के आयात- निर्यात बैंक के साथ-साथ नाबार्ड-राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने ग्रामीण इलाकों और विदेशों, खास तौर से खाड़ी क्षेत्र में राष्ट्रीयकृत बैंकों की शाखाओं के बड़ी संख्या में विस्तार के लिए अथक कार्य किया, इससे कानूनी रूप से भेजे जाने वाले धन की मात्रा में काफी वृद्धि हुई। मुखर्जी ने पंचवर्षीय योजनाओं के लिए 1991 में केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे के लिए एक संशोधित फार्मूला भी तैयार किया जिसे गाडगिल- मुखर्जी फार्मूला के नाम से जाना गया। न्यूयॉर्क से प्रकाशित होने वाले जर्नल ‘यूरो मनी’ के सर्वे में मुखर्जी को 1984 में विश्व के सर्वोत्तम पांच वित्त मंत्रियों में शुमार किया गया था. राष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने एक अमिट छाप छोड़ी. इस दौरान उन्होंने दया याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाया. उनके सम्मुख 34 दया याचिकाएं आईं और इनमें से 30 को उन्होंने खारिज कर दिया. इनमें 2008 मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब, 2001 में संसद हमलों के मुख्य आरोपी अफजल गुरू और 1993 में मुंबई बम धमाके के दोषी याकूब मेनन की याचिका शामिल है. कसाब को 2012, अफजल गुरू को 2013 और याकूब मेनन को 2015 में फांसी हुई थी.

मुखर्जी के पास व्यापक राजनीतिक अनुभव रहा और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक और अफ्रीकी विकास बैंक के गवर्नर के बोर्ड में कार्य किया है। उन्होंने 1982, 1983 और 1984 में राष्ट्रमंडल वित्त मंत्रियों के सम्मेलनों, 1994, 1995, 2005, 2006, 2007 और 2008 में संयुक्त राष्ट्र महासभा, 1995 में ऑकलैंड में राष्ट्रमंडल सरकार प्रमुखों की शिखर बैठक, 1995 में कार्टाजेना में गुटनिरपेक्ष विदेश मंत्री सम्मेलन और 1995 में बांडुंग में अफ्रीकी एशियाई सम्मेलन की 40वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित सम्मेलन में भारतीय शिष्टमंडलों का नेतृत्व किया है। प्रणब मुखर्जी के विशाल व्यतित्व के एक यह भी पहचान रही कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में 2017 में बतौर मुख्य अतिथि शामिल भी हुए थे। एक प्रखर वक्ता और विद्वान मुखर्जी की बौद्धिक क्षमता और राजनीतिक कौशल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वित्तीय मामलों और संसदीय प्रक्रिया के उत्कृष्ट ज्ञान की अत्यंत सराहना की जाती रही है। भारत के जीवंत बहुदलीय लोकतंत्र के प्रमुख अंग विविध राजनीतिक दलों के बीच सर्वसम्मति बनाने की योग्यता के कारण जटिल राष्ट्रीय मुद्दों पर आम सहमति बनाने में उनकी भूमिका प्रशंसनीय रही है। उन्होंने विश्व व्यापार संघठन व भारतीय विशिष्ठ पहचान प्राधिकरण क्षेत्र में भी कार्य किया था, जिसका अनुभव उन्हें भारत की राजनैतिक सफ़र में बहुत काम आया. साल 2019 में उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा भारत रत्न से सम्मानित भी किया गया था. सभी दलों के नेताओं से आत्मीय भाव रखने वाले प्रणब दा को राष्ट्र उनके अतुलनीय योगदान के लिए हमेशा याद करता रहेगा।

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