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क्या मंदिर निर्माण से हो जाएगा नफरत की राजनीति का अंत ?

फाइल फोटो

लखनऊ। अयोध्या में भूमि पूजन कर प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर निर्माण की नींव रख दी है। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के साथ ही मंदिर निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। अब ऐसे में मंदिर निर्माण का लक्ष्य निर्धारित करने वाली राजनीति की अब दिशा क्या होगी और वह किस ओर होगी ?

आज का भारत नब्बे के भारत से भिन्न है। कारण देश में युवाओं की जनसंख्या काफी है। दुर्भाग्य से ज्यादातर बेरोजगार हैं, बेरोजगारी की समस्या कोरोना काल में तो माने ऐसे बढ़ती जा रही है जैसे देश का कुछ वर्ग भुखमरी की ओर बढ़ रहा हो। कहावत भी है कि भूखें भजन नहीं होईं गोपाला। जब भूखे पेट भजन नहीं हो सकते हैं तो और क्या हो सकता है? धर्म-जाति की राजनीति करने वाले खुद के तो पेट भर लेते हैं लेकिन जिनके लिए ये राजनीति करते हैं उनको ही भूखों मरने के लिए छोड़ देते हैं। ये बात केवल एक ही वर्ग की नहीं है। सभी की है शायद इसीलिए ही सही वर्गों के ठेकेदार राजनीतिक समाज में पैदा हो जाते हैं लेकिन ये उसी वर्ग का पेट भर नहीं पाते जिनके लिए ये पैदा हुए हैं।राम की बात करने वाले ये भूल गए कि राम खुद भी कहते थे कि पाप से नफरत करो पापी से नहीं। यहीं बात अन्य धर्मों में भी उन्माद फैलाने वालों पर लगती है। उस धर्म के धर्मावलंबियों ने भी कभी नहीं कहा कि किसी से नफरत करों। सभी धर्मों ने प्रेम को ही सर्वश्रेष्ठ माना। धर्म और जाति के नाम पर नफरत पैदा करने वालों की राजनीतिक स्वीकार्यता अब संशय में पड़ती जा रही है। कारण ये कि अब नौजवान को जीविकोपार्जन का जरिया चाहिए। आज का नौजवान वो नहीं जिसे किसी ने कुछ बता दिया तो उसने वह मान लिया। वह उस बात को सुनने के बाद उस पर रिसर्च करता है। और उसके बाद मानता है। इसलिए 21वीं सदी के परिवेश की राजनीति भी बदलने वाली है इस सदी में नफरत का अंत हो रहा है। पुराने मुद्दे भी खत्म हो रहे हैं। उसके बावजूद भी तनाव नहीं दिख रहा है। यह इस ओर संकेत है कि आज का समाज एक नई सोच वाला है उसकी प्राथमिक चुनौती रोजगार है। उसका पहला ध्येय अपना व परिवार का भरण पोषण करना है।

मंदिर निर्माण का संकल्प लेने वाली बीजेपी ने भले ही न्यायिक प्रक्रिया के रास्ते ही सही पर अपने उद्देश्य को पूरित कर दिया है। नब्बे के दशक में मंडल की काट बना कमंडल हिंदुओं को एकजुट करने में सफल रहा। लेकिन उसको धार तब मिली जब हिंदुत्व और विकास दोनों की सिक्के के पहलु हो गये, यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी बार-बार ये कहते रहे साठ साल बनाम छह साल। उन्होंने कहा जो उन्होंने 60 वर्षों में नहीं किया वह मोदी 6 साल में कर दिखायेंगे। युवाओं के रोजगार की बात हो, गांव के विकास की बात हो या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि की बात हो। वह हर जगह भारत को सश्क्त बनाएंगे। जनता ने विश्वास किया और उन्हें खुले मन से वोट दिया। परिणाम बीजेपी को अकेले ही बहुमत हासिल हो गया। कारण यही था कि इस बार हिंदुत्व के साथ विकास का एजेंडा भी भाजपा के रथ पर सवार था। और बालाकोट के मुद्दे सहित अन्य मुद्दों के कारण मोदी को 2019 के चुनाव में पिछली बार से भी अधिक बढ़त हासिल हुई। लेकिन दूसरें कार्यकाल में बीजेपी को कई ऐसे कामों में सफलता हासिल हुई, जो लंबे समय से उसके एजेंडे में थे मसलन अनुच्छेद 370 और राम मंदिर। अब दोनों ही पूरे हो चुके हैं। ऐसे में बीजेपी अब किस ओर जनता का ध्यान केंद्रित करेगी। बड़ा सवाल है। हिंदुत्व के एजेंडे से सियासत की शुरूआत करने वाली बीजेपी अब जनता की किस नब्ज को पकड़ेगी।

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